Lucknow: उत्तर प्रदेश की राजनीति में रविवार को बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री Yogi Adityanath की सरकार ने मंत्रिमंडल का दूसरा विस्तार किया। लखनऊ स्थित Raj Bhavan में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में छह नए मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली, जबकि दो राज्य मंत्रियों को प्रमोशन देकर स्वतंत्र प्रभार सौंपा गया। इस विस्तार के साथ योगी मंत्रिमंडल की संख्या बढ़कर 60 हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह केवल मंत्रियों का विस्तार नहीं, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीतिक तैयारी का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
इस विस्तार की सबसे चर्चित तस्वीर फतेहपुर-खागा से विधायक कृष्णा पासवान की रही, जिनका सफर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से मंत्री पद तक पहुंचा है। पासी समाज से आने वाली कृष्णा पासवान को राज्य मंत्री बनाया गया है। ग्रामीण पृष्ठभूमि और संघर्ष से निकलकर सत्ता के केंद्र तक पहुंचने की उनकी कहानी भाजपा की सामाजिक इंजीनियरिंग और महिला सशक्तिकरण की राजनीति को मजबूत संदेश देती है। भाजपा इस नियुक्ति के जरिए महिलाओं, दलितों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
मंत्रिमंडल विस्तार में पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और सपा से आए मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। वहीं अजीत पाल और सोमेंद्र तोमर को स्वतंत्र प्रभार देकर संगठन और सरकार के बीच संतुलन साधने की कोशिश की गई है। इसके अलावा कैलाश राजपूत, सुरेंद्र दिलेर और वाराणसी से एमएलसी हंसराज विश्वकर्मा को भी मंत्री पद की जिम्मेदारी मिली है। जातीय समीकरण पर नजर डालें तो भाजपा ने इस विस्तार में ब्राह्मण, ओबीसी और दलित वर्गों को साधने का प्रयास किया है।
2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। सपा-कांग्रेस गठबंधन और PDA फॉर्मूले ने भाजपा को चुनौती दी थी। ऐसे में यह विस्तार पश्चिमी यूपी में जाट वोट बैंक, पूर्वांचल में अति पिछड़े वर्ग और दलित समाज को साधने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। खासतौर पर मनोज पांडेय को मंत्री बनाकर भाजपा ने विपक्षी दलों को स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया है कि पार्टी दलबदलुओं को भी बड़े अवसर देने से पीछे नहीं हटेगी।
हालांकि मंत्रिमंडल विस्तार के बाद असंतोष की आवाजें भी सामने आने लगी हैं। भाजपा विधायक आशा मौर्या ने मौर्य समाज की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए संगठन के भीतर नाराजगी जाहिर की है। आने वाले समय में टिकट वितरण और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर यह असंतोष और बढ़ सकता है।
फिलहाल भाजपा इस विस्तार को सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और राजनीतिक संतुलन का प्रतीक बताकर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है। अब सबसे बड़ी चुनौती नए मंत्रियों के प्रदर्शन और सरकार की योजनाओं को गांव-गरीब तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की होगी।
